Monday, 16 November 2015

भजन



यमुना तट पर वृन्दावन में,
कहना तुझ संग मैं भी नाचूं ।


ग्वाल बाल संग मैं भी मिल कर, तेरी चर्चा छेडू ।
गोपन के संग मिल कर मैं भी चन्दन लेप लगाऊं ॥


कस्तूरी की तिलक लगा कर हर पल तुझे निहारूं ।
तेरी जूठी माखन खा कर, कहना रोम रोम खिल जाऊं ॥


मधुबन में बंसी की धुन से पुलकित मैं हो जाऊं ।
तुझ से प्रेम रचा कर कृष्णा, मोह जाल को तोडू ॥


तेरी आलिंगन से कहना भवसागर को तारुं ।
सचिदानंद तेरी गीतामृत में डूब के मैं खो जाऊं ॥


जय श्री कृष्णा
राधे राधे जी

भैया दूज


भैया दूज - यम द्वितीया | Bhaiya Dooj - Yama Dwitiya

हिन्दू समाज में भाई -बहन के स्नेह व सौहार्द का प्रतीक यह पर्व दीपावली दो दिन बाद मनाया जाता है. यह दिन क्योकि यम द्वितीया भी कहलाता है. इसलिये इस पर्व पर यम देव की पूजा भी की जाती है. एक मान्यता के अनुसार इस दिन जो यम देव की उपासना करता है, उसे असमय मृत्यु का भय नहीं रहता है.

हिन्दूओं के बाकी त्यौहारों कि तरह यह त्यौहार भी परम्पराओं से जुडा हुआ है. इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी आयु की कामना करती हे. बदले में भाई अपनी बहन कि रक्षा का वचज देता है. इस दिन भाई का अपनी बहन के घर भोजन करना विशेष रुप से शुभ होता है.

भैया दूज का पौराणिक महत्व

भाई दूज के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है. कथा अनुसार जब यमपुरी के स्वामी यमराज को अपनी बहन यमुना से मिले बहुत समय व्यतीत हो जाता हैं तब वह बहन से मिलने की इच्छा से उसके पास आते हैं. यमुना जी भाई यम को अचानक इतने दिनों के उपरांत देखती हैं तो बहुत प्रसन्न होती हैं तथा उनका खूब आदर सत्कार करती हैं. बहन यमुना के इस स्नेह भरे मिलन से तथा उसके द्वारा किए गए सेवा भाव से प्रसन्न हो यमराज उन्हें वर मांगने को कहते हैं. यमुना जी उनसे कहती हैं कि वह सभी प्राणियों को अपने भय से मुक्त कर दें.

यम उनके इस कथन को सुन कर सोच में पड़ जाते हैं और कहते हैं कि ऐसा होना तो असंभव है. यदि सभी मेरे भय से मुक्त हो मृत्यु से वंचित हो गए तो पृथ्वी इन सभी को कैसे सह सकेगी. सृष्टि संकट से घिर जाएगी. अत: तुम कुछ और वर मांग लो इस पर यमुना उन्हें कहती हैं कि आप मुझे यह आशीर्वाद प्रदान करें कि इस शुभ दिन को जो भी भाई-बहन यमुना में स्नान कर इस पर्व को मनाएंगे, वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाएंगे.

इस पर प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना को वरदान दिया कि जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके भाई-बहन के इस पवित्र पर्व को मनाएगा, वह अकाल-मृत्यु तथा मेरे भय से मुक्त हो जाएगा. तभी से इस दिन को यम द्वितीया और भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा. जो भी कोई मां यमुना के जल मे स्नान करता है वह आकाल म्रत्यु के भय से मुक्त होता है और मोक्ष को प्राप्त करता है. अत: इस दिन यमुना तट पर यम की पूजा करने का विधान भी है.

भगवान नारायण और .लक्ष्मी माता



एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी से बोले, “लोगो में कितनी भक्ति बढ़ गयी है …. सब “नारायण नारायण” करते हैं !”
..तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!, मुझे पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!”
..तो भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जाप थोड़े ही ना करते हैं !”
..तो माता लक्ष्मी बोली कि , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!”
..भगवान नारायण एक गाँव में ब्राह्मण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा ,“कहाँ के है ?”
तो …भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान का कथा-कीर्तन करना चाहते है…”
..यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहना…”
…गाँव के कुछ लोग इकट्ठा हो गये और सब तैयारी कर दी….पहले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा कर रहे थे तो संगत बढ़ी ! दूसरे और तीसरे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..की कितनी भक्ति है लोगो में….!
लक्ष्मी माता ने सोचा अब देखा जाये कि क्या चल रहा है।
..लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया…. और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी कि माता उसके द्वार पर पहुंची ! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!”
तो वो महिला बोली,”माताजी , साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!”
.लक्ष्मी माता बोली..”पिला दे बेटी थोडा पानी…बहुत प्यास लगी है..”
तो वो महिला लौटा भर के पानी लायी….माता ने पानी पिया और लौटा वापिस लौटाया तो सोने का हो गया था!!
..यह देख कर महिला अचंभित हो गयी कि लौटा दिया था तो स्टील का और वापस लिया तो
सोने का ! कैसी चमत्कारिक माता जी हैं !..अब तो वो महिला हाथ-जोड़ कर कहने लगी कि, “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना खा लीजिये..!” ये सोचा कि खाना खाएगी तो थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास आदि भी सोने के हो जायेंगे।
माता लक्ष्मी बोली, “तुम जाओ बेटी, तुम्हारा प्रवचन का टाइम हो गया!”
..वह महिला प्रवचन में आई तो सही … लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी….
..अब महिलायें यह बात सुनकर चालू सत्संग में से उठ कर चली गयी !!
अगले दिन से कथा में लोगों की संख्या कम हो गयी….तो भगवान ने पूछा कि, “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी ?”
….किसी ने कहा, ‘एक चमत्कारिक माताजी आई हैं नगर में… जिस के घर दूध पीती हैं तो गिलास सोने का हो जाता है,…. थाली में रोटी सब्जी खाती हैं तो थाली सोने की हो जाती है !… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..”
..भगवान नारायण समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है!
इतनी बात सुनते ही देखा कि जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए!
...पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास ! बोले, “ माता, मैं तो भगवान की कथा का आयोजन कर रहा था और आप ने मेरे घर को ही छोड़ दिया !”
माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहले आनेवाली थी ! लेकिन तुमने अपने घर में जिस कथा कार को ठहराया है ना , वो चला जाए तभी तो मैं आऊं !”
सेठ जी बोले, “बस इतनी सी बात !…
अभी उनको धर्मशाला में कमरा दिलवा देता हूँ !”
...जैसे ही महाराज (भगवान्) कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोले, “
"महाराज आप अपना बिस्तर बांधो ! आपकी व्यवस्था अबसे धर्मशाला में कर दी है !!”
महाराज बोले, “अभी तो 2/3 दिन बचे है कथा के…..यहीं रहने दो”
सेठ बोले, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ ! मैं कुछ नहीं सुनने वाला! किसी और मेहमान को ठहराना है।”
..इतने में लक्ष्मी जी आई , कहा कि, “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन से निबट लूँ!”
माता लक्ष्मी जी भगवान् से बोली, “प्रभु , अब तो मान गए?”
भगवान नारायण बोले, “हां लक्ष्मी तुम्हारा प्रभाव तो है, लेकिन एक बात तुम को भी मेरी माननी पड़ेगी कि तुम तब आई, जब संत के रूप में मैं यहाँ आया!!
संत जहां कथा करेंगे वहाँ लक्ष्मी तुम्हारा निवास जरुर होगा…!!”
यह कह कर नारायण भगवान् ने वहां से बैकुंठ के लिए विदाई ली। अब प्रभु के जाने के बाद अगले दिन सेठ के घर सभी गाँव वालों की भीड़ हो गयी। सभी चाहते थे कि यह माता सभी के घरों में बारी 2 आये। पर यह क्या ? लक्ष्मी माता ने सेठ और बाकी सभी गाँव वालों को कहा कि, अब मैं भी जा रही हूँ। सभी कहने लगे कि, माता, ऐसा क्यों, क्या हमसे कोई भूल हुई है ? माता ने कहा, मैं वही रहती हूँ जहाँ नारायण का वास होता है। आपने नारायण को तो निकाल दिया, फिर मैं कैसे रह सकती हूँ ?’ और वे चली गयी।

.......शिक्षा : जो लोग केवल माता लक्ष्मी को पूजते हैं, वे भगवान् नारायण से दूर हो जाते हैं। अगर हम नारायण की पूजा करें तो लक्ष्मी तो वैसे ही पीछे 2 आ जाएँगी, क्योंकि वो उनके बिना रह ही नही सकती ।✅
जहाँ परमात्मा की याद है।
वहाँ लक्ष्मी का वास होता है।
केवल लक्ष्मी के पीछे भागने वालों को न माया मिलती ना ही राम।

सम्पूर्ण पढ़ने के लिए धन्यबाद
इसे सबके साथ बाँटकर आत्मसात् करें।
ज्ञान बांटने से बढ़ता है और केवल अपने पास रखने से खत्म हो जाता है।
Jai Shri Krishna

।।मधुराष्टकम् ।।

 

।।मधुराष्टकम् ।।
 
अधरं मधुरं वदनं मधुरं
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥1॥

(हे कृष्ण !) आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपका जाना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।। 1।।
 
वचनं मधुरं चरितं मधुरं
वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥2॥

आपका बोलना मधुर है, आपके चरित्र मधुर हैं, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपका तिरछा खड़ा होना मधुर है, आपका चलना मधुर है, आपका घूमना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।।2।।
 
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥3॥

आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं , आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है। ।।3।।
 
गीतं मधुरं पीतं मधुरं
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥4॥

आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपका टीका मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥4॥
 
करणं मधुरं तरणं मधुरं
हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥5॥

आपके कार्य मधुर हैं, आपका भाव सागर से तारनाफह मधुर है, आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्यार करना मधुर है, आपके शब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥5॥
 
गुंजा मधुरा माला मधुरा
यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥6॥

आपका गुनगुनाना मधुर है, आपकी माला मधुर है, आपकी यमुना मधुर है, उसकी लहरें मधुर हैं, उसका पानी मधुर है, उसके कमल मधुर हैं, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥6॥
 
गोपी मधुरा लीला मधुरा
युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥7॥

आपकी गोपियाँ मधुर हैं, आपकी लीला मधुर है, आप साथ मधुर हैं, आप के द्वारा मुक्ति देना मधुर हैं, आपका देखना मधुर है, आपकी शिष्टता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥7।।
 
गोपा मधुरा गावो मधुरा
यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥8॥

आपके गोप मधुर हैं, आपकी गायें मधुर हैं, आपकी छड़ी मधुर है, आपकी सृष्टि मधुर है, आपका विकारों का दलन करना मधुर है, आपका वर देना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥8॥
 
केशवाय नमः।गोविन्दाय नमः।
नारायणाय नम:।

कृष्ण कब प्रकट होते हैं? ॥



कृष्ण कब प्रकट होते हैं? ॥

आनन्द स्वरूप में भगवान श्री कृष्ण हमेशा नन्द और यशोदा के गोकुल में ही प्रकट होते हैं।
यशोदा = हमेशा दूसरों को यश प्रदान करने वाली "बुद्धि"
नन्द = दूसरों की निन्दा न करने वाला "मन"
गोकुल = इन्द्रियों का समूह "शरीर"
कृष्णा = भगवान का आनन्द स्वरूप
जब व्यक्ति की बुद्धि सदैव दूसरों को यश देने वाली हो जाती है तो यह बुद्धि "यशोदा" बन जाती है, और व्यक्ति का मन दूसरों की निन्दा से रहित हो जाता है तो यह मन "नन्द" बन जाता है, तब इन्द्रियों के समूह "गोकुल" रूपी शरीर में आनन्द रूप में भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं।
तब हम गाने लगते हैं....
नन्द के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की।
यशोदा के लाला भयो, जय कन्हैया लाल की।
गोकुल में आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की।
क्या हमारे गोकुल में कृष्ण प्रकट हुये?
यदि नहीं तो हमें आज से ही बुद्धि को यशोदा और मन को नन्द बनाने का प्रयत्न आरम्भ कर देना चाहिये।
"जय जय श्री राधे

सच्चा सन्यास



(((((((((( सच्चा सन्यास ))))))))))
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एक व्यक्ति प्यास से बेचैन भटक रहा था. उसे गंगाजी दिखाई पड़ी. पानी पीने के लिए नदी की ओर तेजी से भागा लेकिन नदी तट पर पहुंचने से पहले ही बेहोश होकर गिर गया.
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थोड़ी देर बाद वहां एक संन्यासी पहुंचे. उन्होंने उसके मुंह पर पानी का छींटा मारा तो वह होश में आया. व्यक्ति ने उनके चरण छू लिए और अपने प्राण बचाने के लिए धन्यवाद करने लगा.
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संन्यासी ने कहा- बचाने वाला तो भगवान है. मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है ? शक्ति होती तो मेरे सामने बहुत से लोग मरे मैं उन्हें बचा न लेता. मैं तो सिर्फ बचाने का माध्यम बन गया.
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इसके बाद संन्यासी चलने को हुए तो व्यक्ति ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा. संन्यासी ने पूछा- तुम कहां तक चलोगे. व्यक्ति बोला- जहां तक आप जाएंगे.
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संन्यासी ने कहा मुझे तो खुद पता ही नहीं कि कहां जा रहा हूं और अगला ठिकाना कहां होगा. संन्यासी ने समझाया कि उसकी कोई मंजिल नहीं है लेकिन वह अड़ा रहा. दोनों चल पड़े.
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कुछ समय बाद व्यक्ति ने कहा- मन तो कहता है कि आपके साथ ही चलता रहूं लेकिन कुछ टंटा गले में अटका है. वह जान नहीं छोड़ता. आपकी ही तरह भक्तिभाव और तप की इच्छा है पर विवश हूं.
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संन्यासी के पूछने पर उसने अपने गले का टंटा बताना शुरू किया. घर में कोई स्त्री और बच्चा नहीं है. एक पैतृक मकान है उसमें पानी का कूप लगा है.
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छोटा बागीचा भी है. घर से जाता हूं तो वह सूखने लगता है. पौधों का जीवन कैसे नष्ट करूं. नहीं रहने पर लोग कूप को गंदा करते हैं. नौकर रखवाली नहीं करते, बैल भूखे रहते हैं. बेजुबान जानवर है उसे कष्ट दूं.
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बहुत से संगी-साथी हैं जो मेरे नहीं होने से उदास होते हैं, उनके चेहरे की उदासी देखकर उनका मोह भी नहीं छोड़ पाता.
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दादा-परदादा ने कुछ लेन-देन कर रखा था. उसकी वसूली भी देखनी है. नहीं तो लोग गबन कर जाएंगे. अपने नगर से भी प्रेम है.
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बाहर जाता हूं तो मन उधर खिंचा रहता है. अपने नगर में समय आनंदमय बीत जाता है. लेकिन मैं आपकी तरह संन्यासी बनना चाहता हूं. राह दिखाएं.
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संन्यासी ने उसकी बात सुनी फिर मुस्कराने. लगे. उन्होंने कहा- जो तुम कर रहे हो वह जरूरी है. तुम संन्यास की बात मत सोचो. अपना काम करते रहो.
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व्यक्ति उनकी बात समझ तो रहा था लेकिन उस पर संन्यासी बनने की धुन भी सवार थी.
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चलते-चलते उसका नगर आ गया. उसे घर को देखने की इच्छा हुई. उसने संन्यासी से बड़ी विनती की- महाराज मेरे घर चलें. कम से कम 15 दिन हम घर पर रूकते हैं. सब निपटाकर फिर मैं आपके साथ निकल जाउंगा.
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संन्यासी मुस्कुराने लगे और खुशी-खुशी तैयार हो गए. उसकी जिद पर संन्यासी रूक गए और उसे बारीकी से देखने लगे.
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सोलहवें दिन अपना सामान समेटा और निकलने के लिए तैयार हो गए. व्यक्ति ने कहा-महाराज अभी थोड़ा काम रहता है. पेड़-पौधों का इंतजाम कर दूं. बस कुछ दिन और रूक जाएं निपटाकर चलता हूं.
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संन्यासी ने कहा- तुम हृदय से अच्छे हो लेकिन किसी भी वस्तु से मोह त्यागने को तैयार ही न हो. मेरे साथ चलने से तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता. किसी भी संन्यासी के साथ तुम्हारा भला नहीं हो सकता.
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उसने कहा- कोई है ही नहीं तो फिर किसके लिए लोभ-मोह करूं.
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संन्यासी बोले- यही तो और चिंता की बात है. समाज को परिवार समझ लो, उसकी सेवा को भक्ति. ईश्वर को प्रतिदिन सब कुछ अर्पित कर देना. तुम्हारा कल्याण हो इसी में हो जाएगा. कुछ और करने की जरूरत नहीं.
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वह व्यक्ति उनको कुछ दूर तक छोड़ने आया. विदा होते-होते उसने कहा कि कोई एक उपदेश तो दे दीजिए जो मेरा जीवन बदल दे.
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संन्यासी हंसे और बोले- सत्य का साथ देना, धन का मोह न करना. उन्होंने विदा ली.
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कुछ साल बाद वह संन्यासी फिर वहां आए. उस व्यक्ति की काफी प्रसिद्धि हो चुकी थी. सभी उसे पक्का और सच्चा मानते थे. लोग उससे परामर्श लेते. छोटे-मोटे विवाद में वह फैसला देता तो सब मानते.उसका चेहरा बताता था कि संतुष्ट और प्रसन्न है.
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संन्यासी कई दिन तक वहां ठहरे. फिर एक दिन अचानक तैयार हो गए चलने को.
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उस व्यक्ति ने कहा- आप इतनी जल्दी क्यों जाने लगे. आपने तो पूछा भी नहीं कि मैं आपके उपदेश के अनुसार आचरण कर रहा हूं कि नहीं.
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संन्यासी ने कहा- मैंने तुम्हें कोई उपदेश दिया ही कहां था ? पिछली बार मैंने देखा कि तुम्हारे अंदर निर्जीवों तक के लिए दया है लेकिन धन का मोह बाधा कर रहा था. वह मोह तुम्हें असत्य की ओर ले जाता था हालांकि तुम्हें ग्लानि भी होती थी.
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तुम्हारा हृदय तो सन्यास के लिए ऊर्वर था. बीज पहले से ही पड़े थे, मैंने तो बस बीजों में लग रही घुन के बारे में बता दिया. तुमने घुन हटा दी और फिर चमत्कार हो गया. संन्यास संसार को छोड़कर ही नहीं प्राप्त होता. अवगुणों का त्याग भी संन्यास है.
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हम सब में उस व्यक्ति की तरह सदगुण हैं. जरूरत है उन्हें निखारने की. निखारने वाले की. अपने काम करने के तरीके में थोड़ा बदलाव करके आप चमत्कार कर सकते हैं.
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एक बदलाव आजमाइए- हर किसी से प्रेम से बोलें. उनसे ज्यादा मीठा बोलेंगे जिन पर आपका शासन है. आपमें जो मधुरता आ जाएगी वह जीवन बदल देगी. कम से कम इसे आजमाकर देखिए.
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))

गीता के भावो में ध्यान मग्न काशी नरेश के जीवन की एक घटना



गीता के भावो में ध्यान मग्न काशी नरेश के जीवन की एक घटना
सन् १९१० में काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह बहादुर का एक ऑपरेशन हुआ। पाँच डाक्‍टर यूरोप से ऑपरेशन के लिए आए। पर काशी नरेश ने कहा कि मैं किसी प्रकार का मादक द्रव नहीं ले सकता। क्‍योंकि मैंने मादक द्रव्‍य लेना छोड़ दिया है। इसलिए मैं किसी भी तरह का मादक पदार्थयुक्त बेहोश करने वाली कोई दवा, कोई इंजेक्‍शन भी नहीं ले सकता, क्‍योंकि मादक द्रव मैंने त्‍याग दिये है। न मैं शराब पीता हूं, न सिगरेट पीता हूं, मैं चाय भी नहीं पीता। इसलिए ऑपरेशन तो आप करें लेकिन बिना ऐसे पदार्थों के उपयोग के ।
डॉक्टरों ने कहा-अपेंडिक्‍स का ऑपरेशन है। बड़ा ऑपरेशन होगा कैसे? इतनी भयंकर पीड़ा होगी, और आप चीखे-चिल्‍लाए, उछलने-कूदने लगे तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। आप सह नहीं पाएंगे।" उन्‍होंने कहा कि नहीं, मैं सह पाऊंगा। बस इतनी ही मुझे आज्ञा दें कि मैं अपना गीता का पाठ करता रहूँ। डॉक्टरो ने प्रयोग करके देखा । पहले उँगली काटी, तकलीफ़ें दीं, सूइयाँ चुभायीं, और उनसे कहा कि आप अपना गीता पाठ करते रहे।
कोई दर्द का उन्‍हें पता न चला। फिर ऑपरेशन भी किया गया। वह पहला ऑपरेशन था पूरे मनुष्‍य जाति के इतिहास में, जिसमें किसी तरह के मादक-द्रव्‍य का कोई प्रयोग नहीं किया गया। काशी नरेश पूरे होश में रहे। ऑपरेशन हुआ। डाक्‍टर तो भरोसा न कर सके। जैसे कि लाश पड़ी हो सामने, जिंदा आदमी है कि मुर्दा आदमी हो।
ऑपरेशन के बाद उन्‍होंने पूछा कि यह चमत्‍कार है, आपने किया क्‍या? उन्‍होंने कहा, मैंने कुछ भी नहीं किया। मैं सिर्फ होश संभाले रखा और गीता पढ़ते रहा । इसे जन्‍म भर से पढ़ रहा हूँ और जब मैं गीता पढ़ता हूं फिर मेरे चारों और क्‍या हो रहा इस की मुझे कुछ फिकर नहीं रहती है। मैं तो स्‍वय में डूब जाता हूं। और एक दीपक जलता रहता है बाहर। और मैं अपने होश को मात्र संभाले रहता हूं और यही पाठ का अर्थ होता है। गीता के पाठ से मुझे होश बनता है, जागृति आती है।
बस उसका मैं पाठ करता रहा । जब तक मुझसे भूल चुक नहीं होती तो मैं उसे दोहराता रहूँ तो फिर शरीर मुझसे अलग है।
" न हन्यते हन्‍यमाने शरीरे" तब मैं जानता हूं कि शरीर को काटो, मारो, तो भी तुम मुझे नहीं मार सकते। "नैनं छिंदंति शस्‍त्राणि" तुम छेदों इसे शस्‍त्रों से फिर भी तुम मुझे नहीं छेद सकते हो। बस इतनी मुझे याद बनी रही, उतना काफी था, मैं शरीर नहीं हूं।

हां, अगर मैं गीता न पढ़ता होता तो भूल-चूक हो सकती थी। अभी मेरा होश इतना नहीं है कि सहारे के बिना सध जाए। पाठ का यही अर्थ होता है। अध्‍ययन पाठ का अर्थ है, गीता को मस्‍तिष्‍क से नहीं पढ़ना, गीता को बोध से पढ़ना और गीता पढ़ते वक्‍त गीता जो कह रही है उसके बोध को संभालना। निरंतर-निरंतर अभ्‍यास करने से, बोध संभल जाता है। ।