Monday, 16 November 2015

कुम्हार पर श्रीकृष्ण कृपा



((((( कुम्हार पर श्रीकृष्ण कृपा )))))
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जब भगवान श्रीकृष्ण का ब्रजभूमि में अवतार होना था तो देव, गंधर्वों आदि ने भी ब्रह्माजी से जिद करके ब्रज में विभिन्न रूपों में जन्म लिया था.
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बाल भगवान श्रीकृष्ण भक्तों के साथ चुहल कर लीलाएं करते रहे. गोपियों संग लीला करते भगवान श्रीकृष्ण उनकी मटकी फोड़ते, उनके घरों से माखन चुराते.
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गोपियां श्रीकृष्ण का उलाहना लेकर रोज यशोदा मैय्या के पास जातीं. गोपियां जानती थीं कि वे जितनी शिकायत करेंगी कान्हा उतना ही उन्हें छेंडेंगे.
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एक बार यशोदा माता श्रीकृष्ण के लिए आ रहे उलाहनो से तंग आ गईं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की और दौड़ीं. माता को क्रोध में देखकर बालकृष्ण बचने के लिए भागने लगे.
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भागते-भागते श्रीकृष्ण एक कुम्हार के पास पहुंचे. कुम्हार मिट्टी के घडे बनाने में व्यस्त था. कुम्हार ने श्रीकृष्ण को देखा तो बड़ा प्रसन्न हुआ क्योंकि कुम्हार इस बात से परिचित था कि श्रीकृष्ण भगवान हैं.
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श्रीकृष्ण ने कुम्हार से कहा भाई आज यशोदा माता बहुत क्रोधित हैं. छडी लेकर आ रही हैं. मुझे कहीं छुपा लो बड़ी कृपा होगी. कुम्हार ने श्रीकृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया.
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यशोदा माता वहां आईँ और कुम्हार से पूछा- तुमने कान्हा को देखा ? कुम्हार ने मना कर दिया तो माता वहां से चली गईं. श्रीकृष्ण बडे से घडे के नीचे से छिपकर यह सब सुन रहे थे.
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श्रीकृष्ण ने कुम्हार से कहा- माता चली गईं. अब तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो.
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कुम्हार बोला मैं तो आप को घड़े से बाहर निकाल दूंगा पहले मुझे 84 लाख यानियों के बंधन से तो निकालो प्रभु.
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श्रीकृष्ण ने कुम्हार को मुस्करा कहा- चलो तुम्हें 84 लाख योनियो के बँधन से मुक्त करता हूं. अब तो मुझे घड़े के बंधन से मुक्त कर दो.
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कुम्हार कहने लगा- प्रभु मैं तो आपको घड़े से निकाल दूंगा लेकिन मेरे परिवार के लोगों को भी 84 लाख योनियो के बंधन से मुक्त कर दें.
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प्रभु ने उन्हें भी बंधन मुक्त किया और बोले अब तो मुझे घडे से निकाल दो.
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कुम्हार बोला- प्रभु आप जिस घड़े के नीचे छिपे हैं उसकी मिट्टी मेरे बैल लाद के लाए हैं. मेरे बैलो को भी 84 के बंधन से मुक्त करो.
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श्रीकृष्ण ने कहा- चलो उन बैलों को भी 84 लाख योनियों के बंधन से मुक्त करता हूं. अब तो तुम्हारी सारी इच्छा पूरी कर दी. अब तो घड़े से बाहर निकाल दो.
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कुम्हार ने कहा- एक और इच्छा है प्रभु. जो भी प्राणी हम दोनों के बीच का यह संवाद सुनेगा उसे भी 84 लाख योनियो के बंधन से मुक्त करो.
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कुम्हार की परोपकार की बात से भक्तवत्सल भगवान बड़े प्रसन्न होते हैं. कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरी कर दिया.
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तब जाकर कुम्हार ने प्रभु को घड़े से बाहर निकाला. प्रभु ने गले से लगा लिया और उसे जीवन और मृत्यु के चक्कर से मुक्त कर दिया.
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जो प्रभु गोर्वधन को अपनी एक अंगुली पर उठा सकते हैं वह क्या एक घडा नही उठा सकते थे. यह लीला तो बस प्रभु ने अपने भक्त के हृदय की गहराई की थाह लेने के लिए की. हम श्री कृष्ण लीला का स्मरण करते रहेंगे.
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तेरा दास तुझपे है कुरबान कान्हा !
बडा तेरा मुझपे है एहसान कान्हा !
जमी से उठा कर,
गले से लगाना,
वो अपना बनाना गजब ढा गया !
है मदहोश सारे,
वो जमुना किनारे,
वो बंशी बजाना गजब ढा गया !
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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कृष्ण गोवेर्धन पर्वत लीला



कृष्ण गोवेर्धन पर्वत लीला
भगवान श्री कृष्ण ने गिरिराज को उठा कर ये बताया है की गोवेर्धन पर्वत और कोई नही बल्कि साक्षात मैं ही हूँ। भगवान ने गोवर्धन पर्वत उठाया और भगवान का नाम पड़ा गिरधारी । गोवर्धन जी महाराज कौन हैं। इसके विषय में 2 प्रचलित कथाएं मिलती है। जो इस प्रकार है-
कथा 1
गर्ग संहिता के अनुसार एक बार पुलस्त्य ऋषि भ्रमण करते हुए द्रोणाच पहुंचे। वहां अनेक प्रकार के हरे-भरे वृक्षों से सुसज्जित मनोहारी गोवर्धन पर्वत को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। ऋषिवर ने गोवर्धनजी के पिता द्रोणाचल जी से उनके पुत्र को काशी ले जाने की इच्छा व्यक्त की। द्रोणाचल नही चाहते थे की उनके पुत्र को ऋषि लेके जाएं लेकिन पुलस्त्य के प्रताप से डरकर द्रोणाचल ने उदास मन से हामी भर दी। और गोवर्धन ने ऋषि के सामने यह शर्त रखी कि मार्ग में यदि आप मुझे कहीं भी रख देंगे, तो मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा और वहां से हिलूंगा भी नहीं।
ऋषि पुलस्त्य ने शर्त मान ली और वे अपने योगबल से गोवर्धन को अपनी दाहिनी हथेली पर रखकर काशी की ओर प्रस्थान कर गए। रास्ते में जब वे ब्रज के ऊपर से गुजर रहे थे, तब उन्हें लघुशंका लगी जब लघुशंका के लिए जा रहे थे तो उन्होंने गिरिराज पर्वत को वहीँ धरती पर रख दिया। जब निवृत होकर आये तो इन्होने गोवर्धन को उठाने का बहुत प्रयास किया, पर अपनी शर्त के अनुसार वे अपने स्थान से हिले भी नहीं।
हारकर पुलस्त्य मुनि अकेले ही काशी की ओर चल दिए, पर काशी जाने से पहले पुलस्त्य ऋषि ने गिरिराज गोवर्धन को शाप दे दिया कि दिनोंदिन तुम छोटे होते जाओगे। तुम तिल तिल घटोगे। जिस कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। यह उनके शाप का ही प्रभाव है कि पुराने समय की तुलना में आज गोवर्धन पर्वत का आकार बहुत छोटा हो गया है। पांच हजार साल पहले यह गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था और अब शायद 30 मीटर ही रह गया है।आज भी भक्त गण गिरिराज पर्वत की परिक्रमा करते हैं। पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है।
कथा 2
त्रेता युग में जब राम सेतु बंध का कार्य चल रहा था तो हनुमान जी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे लेकिन सेतु बन्ध का कार्य पूर्ण होने की देव वाणी को सुनकर हनुमान जी ने इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दिया। इससे गोवर्धन पर्वत बहुत दुःखी हुए और उन्होंने हनुमान जी से दुखी होते हुए कहा कि, “मैं श्री राम जी की सेवा और उनके चरण स्पर्श से वंचित रह गया।”
यह वृतांत हनुमान जी ने सेतु बंध पर जाकर श्री राम जी को सुनाया तो राम जी बोले, ” द्वापर युग में मैं इस पर्वत को धारण करुंगा एवं इसे अपना स्वरूप प्रदान करुंगा।” इसलिए गिरिराज पर्वत साक्षात भगवान कृष्ण का ही सवरूप हैं। 🌻🌹💐JAI SRI GIRI GOVARDHAN KI, HARE KRISHNA! SUPRABHATAM!!!

भजन



यमुना तट पर वृन्दावन में,
कहना तुझ संग मैं भी नाचूं ।


ग्वाल बाल संग मैं भी मिल कर, तेरी चर्चा छेडू ।
गोपन के संग मिल कर मैं भी चन्दन लेप लगाऊं ॥


कस्तूरी की तिलक लगा कर हर पल तुझे निहारूं ।
तेरी जूठी माखन खा कर, कहना रोम रोम खिल जाऊं ॥


मधुबन में बंसी की धुन से पुलकित मैं हो जाऊं ।
तुझ से प्रेम रचा कर कृष्णा, मोह जाल को तोडू ॥


तेरी आलिंगन से कहना भवसागर को तारुं ।
सचिदानंद तेरी गीतामृत में डूब के मैं खो जाऊं ॥


जय श्री कृष्णा
राधे राधे जी

भैया दूज


भैया दूज - यम द्वितीया | Bhaiya Dooj - Yama Dwitiya

हिन्दू समाज में भाई -बहन के स्नेह व सौहार्द का प्रतीक यह पर्व दीपावली दो दिन बाद मनाया जाता है. यह दिन क्योकि यम द्वितीया भी कहलाता है. इसलिये इस पर्व पर यम देव की पूजा भी की जाती है. एक मान्यता के अनुसार इस दिन जो यम देव की उपासना करता है, उसे असमय मृत्यु का भय नहीं रहता है.

हिन्दूओं के बाकी त्यौहारों कि तरह यह त्यौहार भी परम्पराओं से जुडा हुआ है. इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी आयु की कामना करती हे. बदले में भाई अपनी बहन कि रक्षा का वचज देता है. इस दिन भाई का अपनी बहन के घर भोजन करना विशेष रुप से शुभ होता है.

भैया दूज का पौराणिक महत्व

भाई दूज के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है. कथा अनुसार जब यमपुरी के स्वामी यमराज को अपनी बहन यमुना से मिले बहुत समय व्यतीत हो जाता हैं तब वह बहन से मिलने की इच्छा से उसके पास आते हैं. यमुना जी भाई यम को अचानक इतने दिनों के उपरांत देखती हैं तो बहुत प्रसन्न होती हैं तथा उनका खूब आदर सत्कार करती हैं. बहन यमुना के इस स्नेह भरे मिलन से तथा उसके द्वारा किए गए सेवा भाव से प्रसन्न हो यमराज उन्हें वर मांगने को कहते हैं. यमुना जी उनसे कहती हैं कि वह सभी प्राणियों को अपने भय से मुक्त कर दें.

यम उनके इस कथन को सुन कर सोच में पड़ जाते हैं और कहते हैं कि ऐसा होना तो असंभव है. यदि सभी मेरे भय से मुक्त हो मृत्यु से वंचित हो गए तो पृथ्वी इन सभी को कैसे सह सकेगी. सृष्टि संकट से घिर जाएगी. अत: तुम कुछ और वर मांग लो इस पर यमुना उन्हें कहती हैं कि आप मुझे यह आशीर्वाद प्रदान करें कि इस शुभ दिन को जो भी भाई-बहन यमुना में स्नान कर इस पर्व को मनाएंगे, वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाएंगे.

इस पर प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना को वरदान दिया कि जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके भाई-बहन के इस पवित्र पर्व को मनाएगा, वह अकाल-मृत्यु तथा मेरे भय से मुक्त हो जाएगा. तभी से इस दिन को यम द्वितीया और भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा. जो भी कोई मां यमुना के जल मे स्नान करता है वह आकाल म्रत्यु के भय से मुक्त होता है और मोक्ष को प्राप्त करता है. अत: इस दिन यमुना तट पर यम की पूजा करने का विधान भी है.

भगवान नारायण और .लक्ष्मी माता



एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी से बोले, “लोगो में कितनी भक्ति बढ़ गयी है …. सब “नारायण नारायण” करते हैं !”
..तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!, मुझे पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!”
..तो भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जाप थोड़े ही ना करते हैं !”
..तो माता लक्ष्मी बोली कि , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!”
..भगवान नारायण एक गाँव में ब्राह्मण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा ,“कहाँ के है ?”
तो …भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान का कथा-कीर्तन करना चाहते है…”
..यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहना…”
…गाँव के कुछ लोग इकट्ठा हो गये और सब तैयारी कर दी….पहले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा कर रहे थे तो संगत बढ़ी ! दूसरे और तीसरे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..की कितनी भक्ति है लोगो में….!
लक्ष्मी माता ने सोचा अब देखा जाये कि क्या चल रहा है।
..लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया…. और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी कि माता उसके द्वार पर पहुंची ! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!”
तो वो महिला बोली,”माताजी , साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!”
.लक्ष्मी माता बोली..”पिला दे बेटी थोडा पानी…बहुत प्यास लगी है..”
तो वो महिला लौटा भर के पानी लायी….माता ने पानी पिया और लौटा वापिस लौटाया तो सोने का हो गया था!!
..यह देख कर महिला अचंभित हो गयी कि लौटा दिया था तो स्टील का और वापस लिया तो
सोने का ! कैसी चमत्कारिक माता जी हैं !..अब तो वो महिला हाथ-जोड़ कर कहने लगी कि, “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना खा लीजिये..!” ये सोचा कि खाना खाएगी तो थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास आदि भी सोने के हो जायेंगे।
माता लक्ष्मी बोली, “तुम जाओ बेटी, तुम्हारा प्रवचन का टाइम हो गया!”
..वह महिला प्रवचन में आई तो सही … लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी….
..अब महिलायें यह बात सुनकर चालू सत्संग में से उठ कर चली गयी !!
अगले दिन से कथा में लोगों की संख्या कम हो गयी….तो भगवान ने पूछा कि, “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी ?”
….किसी ने कहा, ‘एक चमत्कारिक माताजी आई हैं नगर में… जिस के घर दूध पीती हैं तो गिलास सोने का हो जाता है,…. थाली में रोटी सब्जी खाती हैं तो थाली सोने की हो जाती है !… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..”
..भगवान नारायण समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है!
इतनी बात सुनते ही देखा कि जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए!
...पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास ! बोले, “ माता, मैं तो भगवान की कथा का आयोजन कर रहा था और आप ने मेरे घर को ही छोड़ दिया !”
माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहले आनेवाली थी ! लेकिन तुमने अपने घर में जिस कथा कार को ठहराया है ना , वो चला जाए तभी तो मैं आऊं !”
सेठ जी बोले, “बस इतनी सी बात !…
अभी उनको धर्मशाला में कमरा दिलवा देता हूँ !”
...जैसे ही महाराज (भगवान्) कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोले, “
"महाराज आप अपना बिस्तर बांधो ! आपकी व्यवस्था अबसे धर्मशाला में कर दी है !!”
महाराज बोले, “अभी तो 2/3 दिन बचे है कथा के…..यहीं रहने दो”
सेठ बोले, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ ! मैं कुछ नहीं सुनने वाला! किसी और मेहमान को ठहराना है।”
..इतने में लक्ष्मी जी आई , कहा कि, “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन से निबट लूँ!”
माता लक्ष्मी जी भगवान् से बोली, “प्रभु , अब तो मान गए?”
भगवान नारायण बोले, “हां लक्ष्मी तुम्हारा प्रभाव तो है, लेकिन एक बात तुम को भी मेरी माननी पड़ेगी कि तुम तब आई, जब संत के रूप में मैं यहाँ आया!!
संत जहां कथा करेंगे वहाँ लक्ष्मी तुम्हारा निवास जरुर होगा…!!”
यह कह कर नारायण भगवान् ने वहां से बैकुंठ के लिए विदाई ली। अब प्रभु के जाने के बाद अगले दिन सेठ के घर सभी गाँव वालों की भीड़ हो गयी। सभी चाहते थे कि यह माता सभी के घरों में बारी 2 आये। पर यह क्या ? लक्ष्मी माता ने सेठ और बाकी सभी गाँव वालों को कहा कि, अब मैं भी जा रही हूँ। सभी कहने लगे कि, माता, ऐसा क्यों, क्या हमसे कोई भूल हुई है ? माता ने कहा, मैं वही रहती हूँ जहाँ नारायण का वास होता है। आपने नारायण को तो निकाल दिया, फिर मैं कैसे रह सकती हूँ ?’ और वे चली गयी।

.......शिक्षा : जो लोग केवल माता लक्ष्मी को पूजते हैं, वे भगवान् नारायण से दूर हो जाते हैं। अगर हम नारायण की पूजा करें तो लक्ष्मी तो वैसे ही पीछे 2 आ जाएँगी, क्योंकि वो उनके बिना रह ही नही सकती ।✅
जहाँ परमात्मा की याद है।
वहाँ लक्ष्मी का वास होता है।
केवल लक्ष्मी के पीछे भागने वालों को न माया मिलती ना ही राम।

सम्पूर्ण पढ़ने के लिए धन्यबाद
इसे सबके साथ बाँटकर आत्मसात् करें।
ज्ञान बांटने से बढ़ता है और केवल अपने पास रखने से खत्म हो जाता है।
Jai Shri Krishna

।।मधुराष्टकम् ।।

 

।।मधुराष्टकम् ।।
 
अधरं मधुरं वदनं मधुरं
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥1॥

(हे कृष्ण !) आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपका जाना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।। 1।।
 
वचनं मधुरं चरितं मधुरं
वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥2॥

आपका बोलना मधुर है, आपके चरित्र मधुर हैं, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपका तिरछा खड़ा होना मधुर है, आपका चलना मधुर है, आपका घूमना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।।2।।
 
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥3॥

आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं , आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है। ।।3।।
 
गीतं मधुरं पीतं मधुरं
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥4॥

आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपका टीका मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥4॥
 
करणं मधुरं तरणं मधुरं
हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥5॥

आपके कार्य मधुर हैं, आपका भाव सागर से तारनाफह मधुर है, आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्यार करना मधुर है, आपके शब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥5॥
 
गुंजा मधुरा माला मधुरा
यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥6॥

आपका गुनगुनाना मधुर है, आपकी माला मधुर है, आपकी यमुना मधुर है, उसकी लहरें मधुर हैं, उसका पानी मधुर है, उसके कमल मधुर हैं, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥6॥
 
गोपी मधुरा लीला मधुरा
युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥7॥

आपकी गोपियाँ मधुर हैं, आपकी लीला मधुर है, आप साथ मधुर हैं, आप के द्वारा मुक्ति देना मधुर हैं, आपका देखना मधुर है, आपकी शिष्टता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥7।।
 
गोपा मधुरा गावो मधुरा
यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥8॥

आपके गोप मधुर हैं, आपकी गायें मधुर हैं, आपकी छड़ी मधुर है, आपकी सृष्टि मधुर है, आपका विकारों का दलन करना मधुर है, आपका वर देना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥8॥
 
केशवाय नमः।गोविन्दाय नमः।
नारायणाय नम:।

कृष्ण कब प्रकट होते हैं? ॥



कृष्ण कब प्रकट होते हैं? ॥

आनन्द स्वरूप में भगवान श्री कृष्ण हमेशा नन्द और यशोदा के गोकुल में ही प्रकट होते हैं।
यशोदा = हमेशा दूसरों को यश प्रदान करने वाली "बुद्धि"
नन्द = दूसरों की निन्दा न करने वाला "मन"
गोकुल = इन्द्रियों का समूह "शरीर"
कृष्णा = भगवान का आनन्द स्वरूप
जब व्यक्ति की बुद्धि सदैव दूसरों को यश देने वाली हो जाती है तो यह बुद्धि "यशोदा" बन जाती है, और व्यक्ति का मन दूसरों की निन्दा से रहित हो जाता है तो यह मन "नन्द" बन जाता है, तब इन्द्रियों के समूह "गोकुल" रूपी शरीर में आनन्द रूप में भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं।
तब हम गाने लगते हैं....
नन्द के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की।
यशोदा के लाला भयो, जय कन्हैया लाल की।
गोकुल में आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की।
क्या हमारे गोकुल में कृष्ण प्रकट हुये?
यदि नहीं तो हमें आज से ही बुद्धि को यशोदा और मन को नन्द बनाने का प्रयत्न आरम्भ कर देना चाहिये।
"जय जय श्री राधे