Monday, 16 November 2015

सच्चा सन्यास



(((((((((( सच्चा सन्यास ))))))))))
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एक व्यक्ति प्यास से बेचैन भटक रहा था. उसे गंगाजी दिखाई पड़ी. पानी पीने के लिए नदी की ओर तेजी से भागा लेकिन नदी तट पर पहुंचने से पहले ही बेहोश होकर गिर गया.
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थोड़ी देर बाद वहां एक संन्यासी पहुंचे. उन्होंने उसके मुंह पर पानी का छींटा मारा तो वह होश में आया. व्यक्ति ने उनके चरण छू लिए और अपने प्राण बचाने के लिए धन्यवाद करने लगा.
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संन्यासी ने कहा- बचाने वाला तो भगवान है. मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है ? शक्ति होती तो मेरे सामने बहुत से लोग मरे मैं उन्हें बचा न लेता. मैं तो सिर्फ बचाने का माध्यम बन गया.
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इसके बाद संन्यासी चलने को हुए तो व्यक्ति ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा. संन्यासी ने पूछा- तुम कहां तक चलोगे. व्यक्ति बोला- जहां तक आप जाएंगे.
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संन्यासी ने कहा मुझे तो खुद पता ही नहीं कि कहां जा रहा हूं और अगला ठिकाना कहां होगा. संन्यासी ने समझाया कि उसकी कोई मंजिल नहीं है लेकिन वह अड़ा रहा. दोनों चल पड़े.
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कुछ समय बाद व्यक्ति ने कहा- मन तो कहता है कि आपके साथ ही चलता रहूं लेकिन कुछ टंटा गले में अटका है. वह जान नहीं छोड़ता. आपकी ही तरह भक्तिभाव और तप की इच्छा है पर विवश हूं.
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संन्यासी के पूछने पर उसने अपने गले का टंटा बताना शुरू किया. घर में कोई स्त्री और बच्चा नहीं है. एक पैतृक मकान है उसमें पानी का कूप लगा है.
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छोटा बागीचा भी है. घर से जाता हूं तो वह सूखने लगता है. पौधों का जीवन कैसे नष्ट करूं. नहीं रहने पर लोग कूप को गंदा करते हैं. नौकर रखवाली नहीं करते, बैल भूखे रहते हैं. बेजुबान जानवर है उसे कष्ट दूं.
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बहुत से संगी-साथी हैं जो मेरे नहीं होने से उदास होते हैं, उनके चेहरे की उदासी देखकर उनका मोह भी नहीं छोड़ पाता.
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दादा-परदादा ने कुछ लेन-देन कर रखा था. उसकी वसूली भी देखनी है. नहीं तो लोग गबन कर जाएंगे. अपने नगर से भी प्रेम है.
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बाहर जाता हूं तो मन उधर खिंचा रहता है. अपने नगर में समय आनंदमय बीत जाता है. लेकिन मैं आपकी तरह संन्यासी बनना चाहता हूं. राह दिखाएं.
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संन्यासी ने उसकी बात सुनी फिर मुस्कराने. लगे. उन्होंने कहा- जो तुम कर रहे हो वह जरूरी है. तुम संन्यास की बात मत सोचो. अपना काम करते रहो.
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व्यक्ति उनकी बात समझ तो रहा था लेकिन उस पर संन्यासी बनने की धुन भी सवार थी.
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चलते-चलते उसका नगर आ गया. उसे घर को देखने की इच्छा हुई. उसने संन्यासी से बड़ी विनती की- महाराज मेरे घर चलें. कम से कम 15 दिन हम घर पर रूकते हैं. सब निपटाकर फिर मैं आपके साथ निकल जाउंगा.
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संन्यासी मुस्कुराने लगे और खुशी-खुशी तैयार हो गए. उसकी जिद पर संन्यासी रूक गए और उसे बारीकी से देखने लगे.
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सोलहवें दिन अपना सामान समेटा और निकलने के लिए तैयार हो गए. व्यक्ति ने कहा-महाराज अभी थोड़ा काम रहता है. पेड़-पौधों का इंतजाम कर दूं. बस कुछ दिन और रूक जाएं निपटाकर चलता हूं.
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संन्यासी ने कहा- तुम हृदय से अच्छे हो लेकिन किसी भी वस्तु से मोह त्यागने को तैयार ही न हो. मेरे साथ चलने से तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता. किसी भी संन्यासी के साथ तुम्हारा भला नहीं हो सकता.
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उसने कहा- कोई है ही नहीं तो फिर किसके लिए लोभ-मोह करूं.
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संन्यासी बोले- यही तो और चिंता की बात है. समाज को परिवार समझ लो, उसकी सेवा को भक्ति. ईश्वर को प्रतिदिन सब कुछ अर्पित कर देना. तुम्हारा कल्याण हो इसी में हो जाएगा. कुछ और करने की जरूरत नहीं.
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वह व्यक्ति उनको कुछ दूर तक छोड़ने आया. विदा होते-होते उसने कहा कि कोई एक उपदेश तो दे दीजिए जो मेरा जीवन बदल दे.
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संन्यासी हंसे और बोले- सत्य का साथ देना, धन का मोह न करना. उन्होंने विदा ली.
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कुछ साल बाद वह संन्यासी फिर वहां आए. उस व्यक्ति की काफी प्रसिद्धि हो चुकी थी. सभी उसे पक्का और सच्चा मानते थे. लोग उससे परामर्श लेते. छोटे-मोटे विवाद में वह फैसला देता तो सब मानते.उसका चेहरा बताता था कि संतुष्ट और प्रसन्न है.
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संन्यासी कई दिन तक वहां ठहरे. फिर एक दिन अचानक तैयार हो गए चलने को.
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उस व्यक्ति ने कहा- आप इतनी जल्दी क्यों जाने लगे. आपने तो पूछा भी नहीं कि मैं आपके उपदेश के अनुसार आचरण कर रहा हूं कि नहीं.
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संन्यासी ने कहा- मैंने तुम्हें कोई उपदेश दिया ही कहां था ? पिछली बार मैंने देखा कि तुम्हारे अंदर निर्जीवों तक के लिए दया है लेकिन धन का मोह बाधा कर रहा था. वह मोह तुम्हें असत्य की ओर ले जाता था हालांकि तुम्हें ग्लानि भी होती थी.
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तुम्हारा हृदय तो सन्यास के लिए ऊर्वर था. बीज पहले से ही पड़े थे, मैंने तो बस बीजों में लग रही घुन के बारे में बता दिया. तुमने घुन हटा दी और फिर चमत्कार हो गया. संन्यास संसार को छोड़कर ही नहीं प्राप्त होता. अवगुणों का त्याग भी संन्यास है.
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हम सब में उस व्यक्ति की तरह सदगुण हैं. जरूरत है उन्हें निखारने की. निखारने वाले की. अपने काम करने के तरीके में थोड़ा बदलाव करके आप चमत्कार कर सकते हैं.
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एक बदलाव आजमाइए- हर किसी से प्रेम से बोलें. उनसे ज्यादा मीठा बोलेंगे जिन पर आपका शासन है. आपमें जो मधुरता आ जाएगी वह जीवन बदल देगी. कम से कम इसे आजमाकर देखिए.
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))

गीता के भावो में ध्यान मग्न काशी नरेश के जीवन की एक घटना



गीता के भावो में ध्यान मग्न काशी नरेश के जीवन की एक घटना
सन् १९१० में काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह बहादुर का एक ऑपरेशन हुआ। पाँच डाक्‍टर यूरोप से ऑपरेशन के लिए आए। पर काशी नरेश ने कहा कि मैं किसी प्रकार का मादक द्रव नहीं ले सकता। क्‍योंकि मैंने मादक द्रव्‍य लेना छोड़ दिया है। इसलिए मैं किसी भी तरह का मादक पदार्थयुक्त बेहोश करने वाली कोई दवा, कोई इंजेक्‍शन भी नहीं ले सकता, क्‍योंकि मादक द्रव मैंने त्‍याग दिये है। न मैं शराब पीता हूं, न सिगरेट पीता हूं, मैं चाय भी नहीं पीता। इसलिए ऑपरेशन तो आप करें लेकिन बिना ऐसे पदार्थों के उपयोग के ।
डॉक्टरों ने कहा-अपेंडिक्‍स का ऑपरेशन है। बड़ा ऑपरेशन होगा कैसे? इतनी भयंकर पीड़ा होगी, और आप चीखे-चिल्‍लाए, उछलने-कूदने लगे तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। आप सह नहीं पाएंगे।" उन्‍होंने कहा कि नहीं, मैं सह पाऊंगा। बस इतनी ही मुझे आज्ञा दें कि मैं अपना गीता का पाठ करता रहूँ। डॉक्टरो ने प्रयोग करके देखा । पहले उँगली काटी, तकलीफ़ें दीं, सूइयाँ चुभायीं, और उनसे कहा कि आप अपना गीता पाठ करते रहे।
कोई दर्द का उन्‍हें पता न चला। फिर ऑपरेशन भी किया गया। वह पहला ऑपरेशन था पूरे मनुष्‍य जाति के इतिहास में, जिसमें किसी तरह के मादक-द्रव्‍य का कोई प्रयोग नहीं किया गया। काशी नरेश पूरे होश में रहे। ऑपरेशन हुआ। डाक्‍टर तो भरोसा न कर सके। जैसे कि लाश पड़ी हो सामने, जिंदा आदमी है कि मुर्दा आदमी हो।
ऑपरेशन के बाद उन्‍होंने पूछा कि यह चमत्‍कार है, आपने किया क्‍या? उन्‍होंने कहा, मैंने कुछ भी नहीं किया। मैं सिर्फ होश संभाले रखा और गीता पढ़ते रहा । इसे जन्‍म भर से पढ़ रहा हूँ और जब मैं गीता पढ़ता हूं फिर मेरे चारों और क्‍या हो रहा इस की मुझे कुछ फिकर नहीं रहती है। मैं तो स्‍वय में डूब जाता हूं। और एक दीपक जलता रहता है बाहर। और मैं अपने होश को मात्र संभाले रहता हूं और यही पाठ का अर्थ होता है। गीता के पाठ से मुझे होश बनता है, जागृति आती है।
बस उसका मैं पाठ करता रहा । जब तक मुझसे भूल चुक नहीं होती तो मैं उसे दोहराता रहूँ तो फिर शरीर मुझसे अलग है।
" न हन्यते हन्‍यमाने शरीरे" तब मैं जानता हूं कि शरीर को काटो, मारो, तो भी तुम मुझे नहीं मार सकते। "नैनं छिंदंति शस्‍त्राणि" तुम छेदों इसे शस्‍त्रों से फिर भी तुम मुझे नहीं छेद सकते हो। बस इतनी मुझे याद बनी रही, उतना काफी था, मैं शरीर नहीं हूं।

हां, अगर मैं गीता न पढ़ता होता तो भूल-चूक हो सकती थी। अभी मेरा होश इतना नहीं है कि सहारे के बिना सध जाए। पाठ का यही अर्थ होता है। अध्‍ययन पाठ का अर्थ है, गीता को मस्‍तिष्‍क से नहीं पढ़ना, गीता को बोध से पढ़ना और गीता पढ़ते वक्‍त गीता जो कह रही है उसके बोध को संभालना। निरंतर-निरंतर अभ्‍यास करने से, बोध संभल जाता है। ।

अनुसूया माता



किसी नगर में कौशिक नामक एक क्रोधी और निष्ठुर ब्राह्मण रहता था. उसे कोढ़ की बीमारी थी.
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उसकी पत्नी शांडिली अत्यंत मां दुर्गा की बड़ी भक्त था. वह बड़ी पतिव्रता थी और कोढ़ से सड़े-गले पति को सर्वश्रेष्ठ पुरूष और पूजनीय समझती थी.
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एक रात वह अफने पति को कंधे पर लादकर कहीं लेकर जा रही थी. रास्ते में कहीं माण्डव्य मुनि को उसके पैरों की ठोकर लग गई.
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ऋषि क्रोधित हुए और शाप दे दिया.. मूर्ख, स्त्री तेरा पति सूर्योदय होते ही मर जाएगा.
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ऋषि के शाप को सुनकर शांडिली बोली- महाराज, भूल से मेरे पति का पैर आपको लगा. जानबूझकर आपका अपमान नहीं किया. फिर भी आपने शाप दिया.
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मैं शाप देती हूं कि जब तक मैं न कहूं तब तक सूर्य ही उदय न हो.
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माण्डव्य आश्चर्य में पड़े खड़े थे. उन्होंने कहा- तुम इतनी बड़ी तपस्विनी हो कि सूर्य की गति को रोक सकती हो ?
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शांडिनी बोली- मैं तो भगवती की शरणागत हूं, वही मेरे पतिव्रत धर्म की रक्षा करेंगी.
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उसकी बात निष्फल नहीं रही. सूर्य अगली सुबह से लेकर दस दिन तक नहीं निकले. ब्रह्मांड संकट में आ गया.
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देवताओं को बड़ी चिंता हुई. वे अनुसूया जी के पास पहुंचे. अनुसूया जी सबसे बड़ी पतिव्रता स्त्री थीं. उनका प्रभाव देवों से भी अधिक था.
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देवों ने कहा- माता, एक पतिव्रता के प्रभाव के कारण संसार में संकट आ गया है. आपसे ज्यादा योग्य संसार में कोई और स्त्री नहीं होगी जो एक पतिव्रता शांडिली को समझाकर उसका
क्रोध शांत कर सकें.
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अनुसूयाजी शांडिनी के पास पहुंची और उसके कारण उत्पन्न हुए संकट का प्रभाव बताकर वचन वापस लेने का अनुरोध किया.
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अनुसूयाजी ने कहा तुम्हारे पति की मृत्यु के बाद उन्हें फिर से जीवित और स्वस्थ करने का मैं वचन देती हूं.
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शांडिनी को भरोसा हो गया. उसने अपना वचन वापस ले लिया और सूर्य की गति को की अनुमति दे दी.
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सूर्योदय के साथ ही माण्डव्य के शाप के कारण उसका पति मर गया.
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अनुसूयाजी ने सूर्य का आह्वान करते हुए कहा- मेरे पतिव्रत में यदि शक्ति है तो आप इसे मृत पुरुष को पुनः जीवन, स्वास्थ्य और सौ वर्ष तक सुखद गृहस्थ जीवन का आशीर्वाद मिले.
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माण्डव्य ने इसे अपने अहं का प्रश्न बना लिया और बोले- मेरे शाप को कोई काट नहीं सकता. इसे जीवित करने का प्रयास करना व्यर्थ है.
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अनुसूयाजी ने भगवती का स्मरण किया- माता मेरी लाज रखकर माण्डव्य का अहंकार चूर करें.
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अनुसूया माता की स्तुति करने लगी. माता वहां प्रकट हुईं और कौशिक को जीवन औऱ स्वास्थ्य प्रदान किया. माण्डव्य का अहंकार समाप्त हो गया.
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माण्डव्य बोले- आज मैंने दो पतिव्रता नारियों की शक्ति देख ली. पतिव्रता स्त्रियों में स्वयं भगवती का वास हो जाता है.
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हे भगवती मैं अपनी शक्तियों के अनुचित प्रयोग के लिए क्षमा मांगता हूं. माता ने माण्डव्य को क्षमा कर दिया. माण्डव्य तप के लिए चले गए.
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(((((((((( जय जय श्री राधे )))))))))

कार्तिक महीने का एक नाम दामोदर भी है।

सारे गोकुल की रस्सियाँ आ गयीं किन्तु भगवान नहीं बंध पाये.......


पवित्र कार्तिक महीने का एक नाम दामोदर भी है। 'दाम' कहते हैं रस्सी को और 'उदर' कहते हैं पेट को। इस महीने में माता यशोदा ने भगवान नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण के पेट पर रस्सी बाँध कर उन्हें ऊखल से बाँधा था, अतः उनका एक नाम हुआ 'दामोदर'। चूंकि भगवान और उनकी माता के बीच यह लीला कार्तिक के महीने में हुई थी, अतः उस लीला की याद में इस महीने को दामोदर भी कहते हैं।

भगवान तो धरती पर आते ही, अपने भक्तों के लिये हैं। गोपियाँ उनकी प्रिय भक्त। बृज में सुबह-सुबह जब गोपियाँ दही मन्थन करतीं तो उन्हें कन्हैया की यादा ही सताती। उनका यही भाव होता
की काश! नन्द-लाल ये मक्खन - दही खाता, उसके साथ हम खेलतीं, हमारे कहने पर वो छलिया- नटखट नाचता और नन्हें-नन्हें हाथों से मक्खन को पकड़ता। भक्तों की इच्छा को पूरा करने के लिये भगवान उनके यहाँ जाते किन्तु जब देखते की दही-मक्खन तो उनकी पहुँच से दूर ऊपर छींके पर रखा है तो, अपने मित्रों के साथ उसको किसी प्रकार से लूटते। गोपियां इससे आनन्दित तो होतीं किन्तु भगवान को तंग करने के लिये, उनको देखने के लिये, किसी न किसी बहाने से यशोदा माता के यहाँ जातीं और सारी बात भी बता आतीं। माता यशोदा अपने लाल से यही कहतीं की अरे कान्हा! अपने घर में इतन मक्खन-दही है, फिर तू बाहर क्यों जाता है? (नन्द बाबा के यहाँ 9 लाख गायें थीं)

एक दिन माता यशोदा भगवान को दूध पिला रहीं थीं, साथ ही साथ दही रिड़क रही थी। तभी उन्हें
याद आया की रसोई में दूध चूल्हे पर चढ़ाया हुआ था, अब तक ऊबल गया होगा। माता ने लाल को गोद से उतारा और उबलते दूध को आग से उतारने के लिये लपकीं। श्रीकृष्ण ने रोष-लीला प्रकट की और मन ही मन बोलने लगे की मेरा पेट अभी भरा नहीं और माता मुझे गोद से उतार कर रसोई में चली गयी। 

बस फिर क्या था, भगवान ने साम्रने, दही रखे हुये मिट्टी के बर्तन को धीरे से पत्थर मार कर तोड़ दिया जिससे सारे कमरे में दही बिखर गया। परन्तु इससे भी बाल-कृष्ण का गुस्सा शान्त नहीं हुआ। उन्होंने कमरे में रखे सभी दूध और दही की मटकियों को तोड़ डाला। इसके बाद छींके पर
रखे हुये मक्खन व दही के मटकों को तोड़ने के लिये एक ओखली के ऊपर चढ़ गये। श्रीकृष्ण ओखली पर चढ़े ही थे की कुछ बन्दर उस कमरे में आ गये। उन बन्दरों को देखकर श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुये मकखन को बन्दरों की ओर फेंकने लगे। साथा ही साथ चंचल निगाहों से दरवाज़े की ओर भी देख रहे हैं की कहीं माता तो नहीं आ गयी।  

उधर यशोदा मैय्या जब दूध संभाल कर मुड़ीं तो, वे यह देख कर हैरान हो गयीं की दरवाज़े में से दूध-दही-मक्खन बह रहा है। उनका सारा ध्यान गोपाल की ओर गया और वे समझ गयीं की यह सब उसी ने किया है। उन्होंने थोड़ा बढ़ कर देखा की कमरे में क्या हो रहा है। माता को लगा की अगर मैं अचानक कमरे में गयी तो लाला घबरा कर भागेगा तो ओखली से कूदते समय उसको चोट लग सकती है।  माता यशोदा ने भगवान को सचेत करने के लिये कुछ आवाज़ की। माता को देखकर श्रीकृष्ण ओखली से कूद कर सरपट भागे। अपने घर में माखन चोरी की श्रीकृष्ण की यह पहली लीला थी। माता यशोदा श्रीकृष्ण को पकड़ने के लिये उनके पीछे दौड़ीं। 

मैय्या तो माँ के वात्सल्य से भगवान को बालक ही समझ रही थी व उन्होंने सोचा की आज
कन्हैया को सबक सिखाना ही होगा। अतः छड़ी उठाई और उनके पीछे-पीछे भागीं। यह निश्चित है की सर्वशक्तिमान--अनन्त गुणों से विभूषित भगवान यदि अपने आप को न पकड़वायें तो कोई उनको नहीं पकड़ सकता। यदि वे अपने आप को न जनायें तो कोई उन्हें जान भी नहीं सकता। आगे-आगे श्रीकृष्ण और पीछे-पीछे माता यशोदा को देख, नन्द भवन के आड़ोस-पड़ोस की बहुत सी गोपियां इकट्ठे होने लगे। काफी देर यह चलता रहा। माता यशोदा का परिश्रम देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी चाल को थोड़ा धीमा किया। माता ने उन्हें पकड़ लिया और वापिस नन्द-भवन में वहीं पर ले आयीं जहाँ ऊखल पर चढ़ कर भगवान बन्दरों को माखन बाँट रहे थे। सजा देने की भावना से माता यशोदा श्रीकृष्ण को ऊखल से बाँधने लगीं। जब रस्सी से बाँधने लगीं तो रस्सी दो ऊँगल छोटी पड़ गयी। तब माता यशोदा ने पास खड़ी गोपियों को और रस्सियाँ लाने के लिये कहा। माता रस्सी पर रस्सी जोड़ती जाती परन्तु भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य चमत्कारी लीला से हर बार रस्सी दो ऊँगल छोटी पड़ जाती। सारे गोकुल की रस्सियाँ आ गयीं किन्तु भगवान नहीं बंध पाये, रस्सी हमेशा दो ऊँगल छोटी रही। 

भगवान ने अपनी इस लीला के माध्यम से हमें बताया की वे छोटे से गोपाल के रूप में होते हुये भी अनन्त हैं। साथ ही भक्त-वत्सल भी हैं। अपनी वात्सल्य रस की भक्त माता यशोदा की इच्छा पूरी करने के लिये वे लीला-पुरुषोत्तम जब बँधे तो पहली रस्सी से ही बँध गये, बाकी रस्सियों का ढेर यूँ ही पड़ा रहा। इस लीला के बाद से ही भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम हो गया दामोदर।

महान वैष्णव आचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रीमद् भागवत की टीका में हर बार रस्सी के दो ऊँगल कम पड़ने का कारण बताते हैं -- दो ऊँगल अर्थात् मनुष्य की भगवान को पाने की निष्कपट भक्तिमयी चेष्टा (एक ऊँगल) और भगवान की कृपा (दूसरी ऊँगल)। जब दोनों होंगे तब ही भगवान हाथ आयेंगे, नहीं तो कोई भी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता।


Friday, 13 November 2015

श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन




श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम  प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुये। 
एक बार पुलस्त्य मुन तीर्थ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में विचित्र पुष्प व फलों वाले वृक्षों एवं झरने वाले परम रमणीय द्रोणाचल-नन्दन गिरिराज गोवर्धन को देखकर बड़े प्रसन्न हुये।

मुनि द्रोणाचल से मिले और उनसे बोले - मैं काशी में रहता हूँ, काशी में गंगाजी हैं और विश्वेश्वर महादेव जी हैं, वहाँ जाने से पापी लोग भी तत्क्षण मुक्त हो जाते हैं। मेरी इच्छा है कि मैं गोवर्धन को काशी में स्थापित पर उस पर तपस्या करूँ। आप अपना पुत्र मुझे दान में दे दें। उस समय गोवर्धन का आकार आठ योजन (चौंसठ मील) लम्बा, पाँच योजन तक फैला तथा दो योजन ऊँचा था।  

(आजकल गोवर्धन की लम्बाई सात मील देखी जाती है, हालांकि परिक्रमा
का रास्ता चौदह मील का है)

गोवर्धन ने एक शर्त पर मुनि के साथ जाना स्वीकार किया, वह ये कि मुनि यदि भारी समझ कर उन्हें रास्ते में कहीं भी नीचे उतार देंगे तो गोवर्धन वहीं रह जायेंगे। 

पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को अपनी हथेली पर उठाया और धीरे-धीरे काशी की ओर चलने लगे। मार्ग में वे वृजमण्डल आये। वहाँ के अपूर्वे सौन्दर्य के दर्शन करते ही गोवर्धन को श्रीकृष्ण की बाल्यलीला, किशोर लीला आदि
स्मरण हो आयी। श्रीगोवर्धन की वहीं ठहरने की इच्छा हो गयी। उन्होंने अपना भार इतना बढ़ाया कि उस भार से परेशान होकर मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गये। मुनि ने प्रतिज्ञा की थी की वे रास्ते में गोवर्धन जी को नहीं उतारेंगे, सीधा काशी ले जायेंगे। 

अधिक भार होने के कारण मुनि ने श्रीगोवर्धन को वहीं उतार दिया। पुलस्त्य मुनि ने थकान के कारण थोड़ी देर विश्राम किया, फिर गोवर्धन को उनकी हथेली पर आने के लिये कहा। श्रीगोवर्धन ने इन्कार कर दिया। मुनि फिर उन्हें अपनी शक्ति से उठाने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुये। अन्ततः मुनि ने क्रोध में श्राप दिया - तुम ने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया इसलिये प्रतिदिन तुम्हारा तिल के समान आकार कम होता जायेगा।

तभी से गोवर्धन पर्वत एक-एक तिल करके छोटे हो रहे हैं। 
कहते हैं जब तक पृथ्वी पर भगीरथी गंगा और गोवर्धन गिरि हैं तब तक कहीं भी कलि के प्रभाव की प्रबलता नहीं होगी।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीगोवर्धन जी के तत्त्व को और उनकी महिमा को प्रकाशित किया है। श्रीकृष्ण ने ही देवताओं की पूजा बन्द करवाकर श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन किया।

'गोवर्धन' शब्द का एक अर्थ इन्द्रीय-वर्द्धन भी होता है। इसलिये ऐसा भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों के इन्द्रिय-वर्द्धन का नाम हो गोवर्धन पूजा है।
गौवर्धन का अर्थ है-गौ(गाय)+वर्धन(बढोतरी)।
अर्थात् गाय माता का वंश बढाना।
श्रीकृष्ण के यहां नौ लाख गाय थी।

श्रीकृष्ण ने कोई पहाड उंगली पर नहीं उठाया था।
बल्कि गौधन की बढोतरी की थी।
उनकी 1 ऊंगली के इशारे पर सभी ने गाय पालन स्वीकार किया।
जय श्री कृष्णा



वराहपुराण में और पद्मपुराण में ऐसा लिखा है कि पहले ब्रह्मा जी ने 60 हजार वर्ष तक तप किया फिर भी गोपियों की रज नहीं मिली. उसके बाद सतयुग के अंत में ब्रह्मा जी नेफिर तप कियाभगवान ने कहा -कि तुम क्या चाहते हो ?ब्रह्मा जी बोले- कि सब गोपियों की रज मिल जाये व माधुर्यमयी लीलाएँ देखने को मिले.भगवान ने कहा -कि वहाँ पुरुषों का प्रवेश नहीं है.ब्रह्मा जी बोले, फिर ?भगवान ने कहा -कि तुम पर्वत बन जाओ.ब्रह्मा जी बोले- कहाँ ?भगवान ने कहा - कि तुम ब्रज में चले जाओ.ब्रह्मा जी ने कहा- कि ब्रज तो बहुत बड़ा है, कहाँ जायें?भगवान बोले -कि वृषभानुपुर यानि बरसाना चले जाओ. वहाँ पर्वत बन जाना, अपने आप सब लीला मिल जायेगी व गोपियों की चरण रज भी मिल जायेगी. बरसाना – वहाँ नित्य श्री राधा रानी के चरण मिलेंगे.तब ब्रह्मा जी यहाँ आकर पर्वत बन गए.एक कथा आती है बरसाने के पर्वतों के बारे में कि जब भगवान सती अनुसुइया की परीक्षा लेने गये थे तो वहाँ उसने ब्रहमा विष्णु शिव को श्राप दिया कि तुमने बड़ा अमर्यादित व्यवहारकिया है इसीलिए जाओ पर्वत बन जाओ. तो तीनों देवता पर्वत बनगये और उनका नाम त्रिंग हुआ. जब श्री राम जी का सेतु बंधन हो रहा था तो पर्वत लाये जा रहे थे. त्रिंग को जब हुनमान जी ला रहे थे तो आकाशवाणी हुई कि अब पर्वत मत लाओ क्योंकि सेतु बंधन हो चुका है.तो जब हुनमान जी ने उसे यहाँ पर रखा तो गिरिराज जी बोले किहनुमान जी हम तुमको श्राप दे देंगे. हे वानर राज तुमने हमारा प्रभु से मिलन नहीं होने दिया. तो हुनमान जी ने प्रभु से प्रार्थना किया. एक पुराण में लिखा है कि तब राम जी ने कहा कि मैं स्वयं श्री कृष्ण के रूप में उनको अपने हाथों से धारण करूँगा जब कि औरों को तो सिर्फ चरण स्पर्श ही दूंगा.एक और जगह आता है कि स्वयं राम जी आये और उन्होंने जो त्रिंग थे, ब्रह्मा विष्णु शिव, इन तीनों को अलग - अलग करकेयहाँ स्थापित किया. 'नन्दगाँव' में शिव जी को स्थापित किया, 'नन्दीश्वर' के रूप में, और 'गोवर्धन' में विष्णु को'गिरिराज'जी के रूप में, ब्रह्मा जी यहाँ 'बरसाने'में स्थापित किये 'ब्रह्मगिरी पर्वत' के रूप में, आज हम लोग इसब्रह्मगिरी की महिमा सुन रहे हैं यहाँ चार शिखर हैं , चार गढ़ है, मानगढ़, दानगढ़, भानुगढ़, विलासगढ़. ये जितने शिखरहैं ये ब्रह्मा जी के मस्तक हैं."जय जय श्री राधे......