Wednesday, 18 November 2015

(((((((((( सुखों की परछाई ))))))))))


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एक रानी अपने गले का हीरों का हार निकाल कर खूंटी पर टांगने वाली ही थी कि एक बाज आया और झपटा मारकर हार ले उड़ा.
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चमकते हीरे देखकर बाज ने सोचा कि खाने की कोई चीज हो. वह एक पेड़ पर जा बैठा और खाने की कोशिश करने लगा.
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हीरे तो कठोर होते हैं. उसने चोंच मारा तो दर्द से कराह उठा. उसे समझ में आ गया कि यह उसके काम की चीज नहीं. वह हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ उड़ गया.
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रानी को वह हार प्राणों सा प्यारा था. उसने राजा से कह दिया कि हार का तुरंत पता लगवाइए वरना वह खाना-पीना छोड़ देगी. राजा ने कहा कि दूसरा हार बनवा देगा लेकिन उसने जिद पकड़ ली कि उसे वही हार चाहिए.
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सब ढूंढने लगे पर किसी को हार मिला ही नहीं. रानी तो कोप भवन में चली गई थी. हारकर राजा ने यहां तक कह दिया कि जो भी वह हार खोज निकालेगा उसे वह आधे राज्य का अधिकारी बना देगा.
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अब तो होड़ लग गई. राजा के अधिकारी और प्रजा सब आधे राज्य के लालच में हार ढूंढने लगे.
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अचानक वह हार किसी को एक गंदे नाले में दिखा. हार दिखाई दे रहा था, पर उसमें से बदबू आ रही थी लेकिन राज्य के लोभ में एक सिपाही कूद गया.
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बहुत हाथ-पांव मारा, पर हार नहीं मिला. फिर सेनापति ने देखा और वह भी कूद गया. दोनों को देख कुछ उत्साही प्रजा जन भी कूद गए. फिर मंत्री कूदा.
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इस तरह जितने नाले से बाहर थे उससे ज्यादा नाले के भीतर खड़े उसका मंथन कर रहे थे. लोग आते रहे और कूदते रहे लेकिन हार मिला किसी को नहीं.
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जैसे ही कोई नाले में कूदता वह हार दिखना बंद हो जाता. थककर वह बाहर आकर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता.
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आधे राज्य का लालच ऐसा कि बड़े-बड़े ज्ञानी, राजा के प्रधानमंत्री सब कूदने को तैयार बैठे थे. सब लड़ रहे थे कि पहले मैं नाले में कूदूंगा तो पहले मैं. अजीब सी होड़ थी.
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इतने में राजा को खबर लगी. राजा को भय हुआ कि आधा राज्य हाथ से निकल जाए, क्यों न मैं ही कूद जाऊं उसमें ? राजा भी कूद गया.
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एक संत गुजरे उधर से. उन्होंने राजा, प्रजा, मंत्री, सिपाही सबको कीचड़ में सना देखा तो चकित हुए.
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वह पूछ बैठे- क्या इस राज्य में नाले में कूदने की कोई परंपरा है ? लोगों ने सारी बात कह सुनाई.
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संत हंसने लगे, भाई ! किसी ने ऊपर भी देखा ? ऊपर देखो, वह टहनी पर लटका हुआ है. नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है. राजा बड़ा शर्मिंदा हुआ.

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हम सब भी उस राज्य के लोगों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. हम जिस सांसारिक चीज में सुख-शांति और आनंद देखते हैं दरअसल वह उसी हार की तरह है जो क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है.
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हम भ्रम में रहते हैं कि यदि अमुक चीज मिल जाए तो जीवन बदल जाए, सब अच्छा हो जाएगा. लेकिन यह सिलसिला तो अंतहीन है.
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सांसारिक चीजें संपूर्ण सुख दे ही नहीं सकतीं. सुख शांति हीरों का हार तो है लेकिन वह परमात्मा में लीन होने से मिलेगा. बाकी तो सब उसकी परछाई है.
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))

मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल



गोकुल में एक मोर रहता था. वह रोज़ भगवान कृष्ण भगवान के दरवाजे पर बैठकर एक भजन गाता था- “मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे”.
रोज आते-जाते भगवान के कानों में उसका भजन तो पड़ता था लेकिन कोई खास ध्यान न देते. मोर भगवान के विशेष स्नेह की आस में रोज भजन गाता रहा.
एक-एक दिन करते एक साल बीत गए. मोर बिना चूके भजन गाता रहा. प्रभु सुनते भी रहे लेकिन कभी कोई खास तवज्जो नहीं दिया.
बस वह मोर का गीत सुनते, उसकी ओर एक नजर देखते और एक प्यारी सी मुस्कान देकर निकल जाते. इससे ज्यादा साल भर तक कुछ न हुआ तो उसकी आस टूटने लगी.
साल भर की भक्ति पर भी प्रभु प्रसन्न न हुए तो मोर रोने लगा. वह भगवान को याद करता जोर-जोर से रो रहा था कि उसी समय वहां से एक मैना उडती जा रही थी.
उसने मोर को रोता हुआ देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इस बात का नहीं था कि कोई मोर रो रहा है अचंभा इसका था कि श्रीकृष्ण के दरवाजे पर भी कोई रो रहा है!
मैना सोच रही थी कितना अभागा है यह पक्षी जो उस प्रभु के द्वार पर रो रहा है जहां सबके कष्ट अपने आप दूर हो जाते हैं.
मैना, मोर के पास आई और उससे पूछा कि तू क्यों रो रहा है?
मोर ने बताया कि पिछले एक साल से बांसुरी वाले छलिये को रिझा रहा है, उनकी प्रशंसा में गीत गा रहा है लेकिन उन्होंने आज तक मुझे पानी भी नही पिलाया.

यह सुन मैना बोली- मैं बरसाने से आई हूं. तुम भी मेरे साथ वहीं चलो. वे दोनों उड़ चले और उड़ते-उड़ते बरसाने पहुंच गए.
मैना बरसाने में राधाजी के दरवाजे पर पहुंची और उसने अपना गीत गाना शुरू किया- श्री राधे-राधे-राधे, बरसाने वाली राधे.
मैना ने मोर से भी राधाजी का गीत गाने को कहा. मोर ने कोशिश तो की लेकिन उसे बांके बिहारी का भजन गाने की ही आदत थी.
उसने बरसाने आकर भी अपना पुराना गीत गाना शुरू कर दिया- मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे”
राधाजी के कानों में यह गीत पड़ा. वह भागकर मोर के पास आईं और उसे प्रेम से गले लगा लगाकर दुलार किया.
राधाजी मोर के साथ ऐसा बर्ताव कर रही थीं जैसे उनका कोई पुराना खोया हुआ परिजन वापस आ गया है. उसकी खातिरदारी की और पूछा कि तुम कहां से आए हो?
मोर इससे गदगद हो गया. उसने कहना शुरू किया- जय हो राधा रानी आज तक सुना था की आप करुणा की मूर्ति हैं लेकिन आज यह साबित हो गया.
राधाजी ने मोर से पूछा कि वह उन्हें करुणामयी क्यों कह रहा है. मोर ने बताया कि कैसे वह सालभर श्याम नाम की धुन रमाता रहा लेकिन कन्हैया ने उसे कभी पानी भी न पिलाया.
राधाजी मुस्कराईं. वह मोर के मन का टीस समझ गई थीं और उसका कारण भी.
राधाजी ने मोर से कहा कि तुम गोकुल जाओ. लेकिन इसबार पुराने गीत की जगह यह गाओ- जय राधे राधे राधे, बरसाने वाली राधे.
मोर का मन तो नहीं था करुणामयी को छोडकर जाने का, फिर भी वह गोकुल आया राधाजी के कहे मुताबिक राधे-राधे गाने लगा.
भगवान श्रीकृष्ण के कानों में यह भजन पड़ा और वह भागते हुए मोर के पास आए, गले से लगा लिया और उसका हाल-चाल पूछने लगे.
श्रीकृष्ण ने पूछा कि मोर तुम कहां से आए हो. इतना सुनते ही मोर भड़क गया.
मोर बोला- वाह छलिये एक साल से मैं आपके नाम की धुन रमा रहा था, लेकिन आपने तो कभी पानी भी नहीं पूछा. आज जब मैंने पार्टी बदल ली तो आप भागते चले आए.

भगवान मुस्कुराने लगे. उन्होंने मोर से फिर पूछा कि तुम कहां से आए हो.
मोर सांवरिए से मिलने के लिए बहुत तरसा था. आज वह अपनी सारी शिकवा-शिकायतें दूर कर लेना चाहता था.
उसने प्रभु को याद दिलाया- मैं वही मोर हूं जो पिछले एक साल से आपके द्वार पर “मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे” गाया करता था.
सर्दी-गर्मी सब सहता एक साल तक आपके दरवाजे पर डटा रहा और आपकी स्तुति करता रहा लेकिन आपने मुझसे पानी तक न पूछा. मैं फिर बरसाने चला गया. राधाजी मिलीं. उन्होंने मुझे पूरा प्यार-दुलार दिया.
भगवान श्रीकृष्ण मुग्ध हो गए. उन्होंने मोर से कहा- मोर, तुमने राधा का नाम लिया यह तुम्हारे लिए वरदान साबित होगा. मैं वरदान देता हूं कि जब तक यह सृष्टि रहेगी, तुम्हारा पंख सदैव मेरे शीश पर विराजमान होगा.

पागल बाबा का बनवाया हुआ बिहारी जी का मंदिर


वृंदावन में एक कथा प्रचलित है कि एक गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी का परम भक्त था।
एक बार उसने एक महाजन से कुछ रुपये उधार लिए। हर महीने उसे थोड़ा- थोड़ा करके वह चुकता करता था। जब अंतिम किस्त रह गई तब महाजन ने उसे अदालती नोटिस भिजवा दिया कि अभी तक उसने उधार चुकता नहीं किया है, इसलिए पूरी रकम मय व्याज वापस करे।
ब्राह्मण परेशान हो गया। महाजन के पास जा कर उसने बहुत सफाई दी, अनुनय-विनय किया, लेकिन महाजन अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ।
मामला कोर्ट में पहुंचा।कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से वही बात कही,
मैंने सारा पैसा चुका दिया है। महाजन झूठ बोल रहा है।

जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके सामने तुम महाजन को पैसा देते थे।
कुछ सोच कर उसने कहा,

हां, मेरी तरफ से गवाही बांके बिहारी देंगे।
अदालत ने गवाह का पता पूछा तो ब्राह्मण ने बताया, बांके बिहारी, वल्द वासुदेव, बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन।
उक्त पते पर सम्मन जारी कर दिया गया।
पुजारी ने सम्मन को मूर्ति के सामने रख कर कहा,
भगवन, आप को गवाही देने कचहरी जाना है।

गवाही के दिन सचमुच एक बूढ़ा आदमी जज के सामने खड़ा हो कर बता गया कि पैसे देते समय मैं साथ होता था और फलां- फलां तारीख को रकम वापस की गई थी।
जज ने सेठ का बही- खाता देखातो गवाही सच निकली। रकम दर्ज थी, नाम फर्जी डाला गया था।जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दिया। लेकिन उसके मन में यह उथल पुथल मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन।
उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि वह तो सर्वत्र रहता है, गरीबों की मदद के लिए अपने आप आता है।
इस घटना ने जज को इतना उद्वेलित किया कि वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़ कर फकीर बन गया।
बहुत साल बाद वह वृंदावन लौट कर आया पागल बाबा के नाम से।
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आज भी वहां पागल बाबा का बनवाया हुआ बिहारी जी का एक मंदिर है।...
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बोल वृंदावन बिहारी लाल की जय

भगवान की परिक्रमा


मंदिर में पूजा व आराधना के बाद हम मंदिर या प्रतिमा के चारो ओर परिक्रमा करते हैं। सामान्यत: देवी-देवताओं की परिक्रमा सभी करते हैं, लेकिन अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि परिक्रमा क्यों की जाती है।
इस संबंध धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से हमारे पाप खत्म होते है। देवी-देवताओं की कृपा से पैसों की परेशानी से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में प्रेम बना रहता है।
आरती, पूजन और मंत्र जप के असर से मंदिर क्षेत्र में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती रहती है। जब परिक्रमा करते है तो मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा हमें अधिक मात्रा में मिलती है और इसी वजह से श्रद्धालुओं को शांति और सुख का अनुभव होता है। मंदिर से प्राप्त होने वाली सकारात्मक ऊर्जा व दैवीय शक्ति हमें चिंताओं से मुक्त करती है। हमारा मन भगवान की भक्ति में रम जाता है।
परिक्रमा के माध्यम से हम दैवीय शक्ति ग्रहण कर पाते हैं, इसी वजह से परिक्रमा की परंपरा बनाई गई है। जिससे भक्तों की सोच भी सकारात्मक बनती है और बुरे विचारों से मुक्ति मिलती है। प्रतिमा की परिक्रमा करने से हमारे मन को भटकाने वाले विचार खत्म हो जाते हैं और शरीर ऊर्जावान होता है। कार्यों में सफलता मिलती हे

श्री राधा का विशुद्ध प्रेम

एक बार किसी ने श्री राधा के पास आकर श्री कृष्ण के स्वरुप र्सोंदर्य का और सद्गुणों का अभाव बतलाया और कहा कि - वे तुमसे प्रेम नही करते|
श्री राधा जी सर्वश्रेष्ठ विशुद्ध प्रेम की संपूर्ण प्रतिमा है अतः वे बोलीं:-
''असुंदरः सुंदरशेखरो वा गुणैविहीनो गुणीनां वरो वा द्वेषी मयि स्यात करूणाम्बुधिर्वा श्यामःस एवाघ गतिर्ममायम''

अर्थात - हमारे प्रियतम श्री कृष्ण असुंदर हो सुंदर शिरोमणि हो, गुणहीन हो या गुणियों में श्रेष्ठ ,मेरे प्रति द्वेष रखते हो या करूणा वरूणावलय रूप से कृपा करते हो, वे श्यामसुंदर ही मेरी एकमात्र गति हैं ...
महाप्रभु ने भी कहा है – वे चाहे मुझे हृदय से लगा ले या मुझको पैरों तले रौद डाले अथवा दर्शन से वंचित रख मर्मार्हत कर दे|
वे जैसे चाहे वैसे करे
मेरे प्राणनाथ तो वे ही है दूसरा कोई नही |

जैसे चातक होता है वह केवल एक मेघ से ही स्वाति की बूँद चाहता है न दूसरे की ओर ताकता है, न दूसरा जल स्पर्श करता है |
चातक कहता क्या है - चाहे तुम ठीक समय पर बरसो, चाहे जीवनभर कभी ना बरसो ,परन्तु इस चित्त चातक को केवल तुम्हारी आशा है,
अपने प्यारे मेघ का नाम रटते- रटते चातक की जीभ लट गई और प्यास के मारे अंग सुख गए, तो भी चातक के प्रेम का रंग तो नित्य नवीन और सुंदर ही होता जाता है ,
समय पर मेघ बरसता तो नही , उलटे कठोर पत्थर, ओले बरसाकर, उसने चातक की पंखो के टुकड़े - टुकड़े कर दिए, इतने पर भी प्रेम टेकी चातक के प्रेम प्रण में कभी चूक नहीं पड़ती |

मेघ बिजली गिराकर, ओले बरसाकर, और तूफान के झकोरे देकर ,चातक पर चाहे जितना बड़ा भारी रोष प्रकट करे पर चातक को प्रियतम का दोष देखकर क्रोध नही आता ,उसे दोष दीखता ही नही है |
गर्मियों के दिन थे, चातक शरीर से थका था, रास्ते में जा रहा था, शरीर जल रहा था, इतने में कुछ वृक्ष दिखायी दिये, दूसरे पक्षियों ने कहा इन पर जरा विश्राम कर लो परन्तु अनन्य प्रेमी चातक को यह बात अच्छी नहीं लगी क्योंकि वे वृक्ष दूसरे जल से सीचे हुए थे|
एक चातक उड़ा जा रहा था किसी बहेलिये ने उसे तीर मारा वह गंगा जी में गिर पड़ा, परन्तु गिरते ही उस अनन्य प्रेमी चातक ने चोच को उलटकर ऊपर की ओर कर लिया |
चातक के प्रेम रूपी वस्त्र पर मरते दम तक भी खोच तक नही लगी |
विशुद्ध प्रेम रुप, गुण और बदले में सुख प्राप्त करने कि अपेक्षा नहीं करता,
''गुणरहितं कामना रहितं'' और वह बिना किसी हेतु के ही प्रतिक्षण सहज ही बढ़ता रहता है

''प्रतिक्षण वर्धमानम्''
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प्रेम से कहिये。。。

श्री राधे! श्री राधे!!
श्री राधे!! श्री राधे!

भजन

तेरी अँखियाँ है जादू भरी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी..!!

सुनलो मेरे श्याम सलोना,
तुमने ही मुझपर कर दिया टोना,

मैं तो तेरे ही द्वारे पड़ी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी,


तेरी अँखियाँ है जादू भरी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी..!!

तुमसा ठाकुर और न पाया
तुमसे मैं ने ही नेहा लगाया,

मेरी अँखियाँ तुमसे लड़ी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी,

तेरी अँखियाँ है जादू भरी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी..!!

कृपा करो हरिदास के स्वामी
बांकें बिहारी अन्तर्यामी,

मेरी टूटे न भजन की लड़ी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी,

तेरी अँखियाँ है जादू भरी
बिहारीजी मैं कब से खड़ी...!!

............श्री राधे ....

श्रीगोपीनाथ"

एक संत थे और अपने ठाकुर "श्रीगोपीनाथ" की तन्मय होकर सेवा-अर्चना करते थे। उन्होंने कोई शिष्य नहीं बनाया था परन्तु उनके सेवा-प्रेम के वशीभूत होकर कुछ भगवद-प्रेमी भक्त उनके साथ ही रहते थे। कभी-कभी परिहास में वे कहते कि -"बाबा ! जब तू देह छोड़ देगो तो तेरो क्रिया-कर्म कौन करेगो?"
बाबा सहज भाव से उत्तर देते कि -"कौन करेगो? जेई गोपीनाथ करेगो ! मैं जाकी सेवा करुँ तो काह जे मेरो संस्कार हू नाँय करेगो !"
समय आने पर बाबा ने देह-त्याग किया। उनके दाह-संस्कार की तैयारियाँ की गयीं। चिता पर लिटा दिया गया। अब भगवद-प्रेमी भक्तों ने उनके अति-प्रिय, निकटवर्ती एक किशोर को अग्नि देने के लिये पुकारा तो वह वहाँ नहीं था तो कुछ लोग उसे बुलाने गाँव गये परन्तु वह न मिला, इसके बाद दूसरे की खोज हुयी और वह भी न मिला। संध्या होने लगी थी, लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह किशोर शीघ्र आवे तो संस्कार संपन्न हो। अचानक प्रतीत हुआ कि किसी किशोर ने चिता की परिक्रमा कर उसमें अग्नि लगा दी। बाबा की देह का अग्नि-संस्कार होने लगा। दाह-संस्कार करने वाले को श्वेत सूती धोती और अचला [अंगोछा] धारण कराया जाता है सो भगवद-प्रेमियों ने उनके निकटवर्ती किशोर का नाम लेकर पुकारा ताकि उसे वस्त्र दिये जा सकें। किन्तु वह किशोर तो वहाँ था ही नहीं। सब एकत्रित हुए, आपस में पूछा कि किसने दाह-संस्कार किया परन्तु किसी के पास कोई उत्तर न था। संभावना व्यक्त की गयी कि कदाचित वायुदेव ने इस कार्य में सहायता की सो उन श्वेत वस्त्रों को उस चिता में ही डाल दिया गया। सब लौट आये।
प्रात: ठाकुर श्रीगोपीनाथ का मंदिर, मंगला-आरती के लिये खोला गया और क्या अदभुत दृष्य है ! ठाकुर गोपीनाथ श्वेत सूती धोती को ही धारण किये हुए हैं और उनके कांधे पर अचला पड़ा है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई वस्त्र अथवा श्रंगार नहीं है। नत-मस्तक हो गये सभी। भक्त और भगवान ! कैसा अदभुत प्रेम ! कैसा अदभुत विश्वास ! एक-दूसरे को कैसा समर्पण ! जय हो-जय हो से समस्त प्रांगण गुँजायमान हो गया।
हे मेरे श्यामा-श्याम ! दास की भी यही आपसे प्रार्थना है। दास के पास देने को वैसा प्रेम और समर्पण तो नहीं है परन्तु आप तो सर्व-शक्तिमान और परम कृपालु प्रेमी हैं और दास का प्रेम-समर्पण भले ही न हो परन्तु विश्वास में तो आपकी कृपा से कोई न्यूनता नहीं है। तो हे प्रभु ! समय आने पर एक बार फ़िर ........।
जय जय श्री राधे !